
कोरबा/पसान। कटघोरा वनमंडल के पसान वन परिक्षेत्र अंतर्गत लैंगा सर्किल के चंद्रौटी बीट में सढ़ामार बांध के पास कथित अवैध कटाई का मामला सामने आने के बाद वन विभाग की निगरानी व्यवस्था सवालों के घेरे में है। जंगल के भीतर जगह-जगह गुंजा, सलेहा और सरई-साल के पेड़ों के कटे हुए ठूंठ दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। यदि मौके पर कटे पेड़ों के अवशेष की पुष्टि होती है, तो यह वन सुरक्षा और गश्ती व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कटाई पर विभाग अनजान कैसे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस वन क्षेत्र की निगरानी के लिए बीट स्तर पर वन अमला तैनात है, उसी क्षेत्र में कथित रूप से पेड़ों की कटाई होती रही और जिम्मेदार कर्मचारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी—तो नियमित गश्त और निगरानी आखिर किस स्तर पर हो रही थी?

स्थानीय स्तर पर यह भी बताया जा रहा है कि इससे पहले खाम्हरिया के पास सागौन जैसे कीमती इमारती पेड़ों की कथित कटाई का मामला सामने आया था। उस समय भी मौके के जिम्मेदार बीट गार्ड और डिप्टी रेंजर द्वारा कथित तौर पर “जानकारी नहीं है” कहकर मामले से अनभिज्ञता जताई गई थी।
अब सढ़ामार बांध के पास सामने आए ताजा मामले ने पुराने सवालों को फिर सामने ला दिया है।
जंगल की रखवाली या शिकायतकर्ता पर सवाल?
इस पूरे मामले की जानकारी ग्रामीण राय सिंह द्वारा मीडिया को दिए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि वन कटाई की जानकारी सामने आने के बाद विभाग द्वारा मामले की वास्तविकता की जांच करने के बजाय जानकारी उजागर करने वाले व्यक्ति को ही निशाना बनाए जाने की स्थिति बन रही है।

ऐसे में सवाल सीधा है—
“अगर जंगल में कटाई रोकना विभाग की जिम्मेदारी है, तो कटाई की सूचना देने वाला सवालों के घेरे में क्यों?”
स्वतंत्र जांच से ही सामने आएगा सच
स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि सढ़ामार बांध और खाम्हरिया क्षेत्र में हुई कथित कटाई की स्वतंत्र टीम से जांच कराई जाए। मौके का भौतिक सत्यापन, कटे पेड़ों की प्रजाति और संख्या का आकलन तथा संबंधित बीट में तैनात कर्मचारियों की गश्ती एवं निगरानी व्यवस्था की जांच की जाए।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि संबंधित क्षेत्र में वन विभाग की ओर से कब-कब गश्त की गई, क्या निरीक्षण दर्ज हुआ और कथित कटाई की जानकारी विभाग तक कब पहुंची।
सबसे बड़ा सवाल
जंगल में पेड़ कटते रहे, ठूंठ मौके पर पड़े रहे और फिर भी जिम्मेदार अमला अनजान रहा—तो आखिर वन क्षेत्र की निगरानी कौन कर रहा है?
अब निगाहें वन विभाग की कार्रवाई पर हैं। क्या विभाग मौके का निष्पक्ष सत्यापन कर वास्तविक स्थिति सामने लाएगा, या मामला भी “जानकारी नहीं है” के जवाब के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
The Public Voice की मांग:
जंगल की सुरक्षा पर सवाल है तो जांच भी मौके पर होनी चाहिए—कागजों पर नहीं।





