EXPOSE: चैतमा रेंज में जंगल साफ… रेंजर साहब को खबर तक नहीं!
तेलसरा सर्किल के बरसघट्टी जंगल में सैकड़ों पौधों की कथित कटाई का मामला—वन सुरक्षा की निगरानी पर गंभीर सवाल

जंगल में आरा चलता रहा या विभाग की निगरानी सोती रही? अब कटे पौधों के साथ जवाबदेही भी तय करने की मांग
कटघोरा/कोरबा। कटघोरा वन मंडल के चैतमा वन परिक्षेत्र से सामने आया तेलसरा सर्किल के बरसघट्टी जंगल में सैकड़ों पौधों की कथित कटाई का मामला अब वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है।
मामला अगर सिर्फ कुछ पौधों की कटाई का होता तो इसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज किया जा सकता था, लेकिन सैकड़ों पौधों की कटाई की बात सामने आना अपने आप में गंभीर है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर चैतमा रेंज में हो क्या रहा है?
जंगल की सुरक्षा के लिए वन विभाग का मैदानी अमला तैनात है। बीट स्तर पर गश्त और निगरानी की जिम्मेदारी तय है। रेंज स्तर पर अधिकारियों को पूरे क्षेत्र की निगरानी करनी होती है।
फिर सवाल उठना लाजिमी है—
अगर जंगल में कथित तौर पर सैकड़ों पौधे काट दिए गए, तो इसकी जानकारी रेंज कार्यालय तक क्यों नहीं पहुंची?
क्या नियमित गश्त नहीं हुई?
क्या बीट निरीक्षण सिर्फ कागजों में हुआ?
क्या रेंजर स्तर से क्षेत्र की प्रभावी निगरानी हो रही थी?
या फिर—
“जंगल की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है?”
कटे पौधे पूछ रहे हैं—जिम्मेदार कौन?
बरसघट्टी जंगल में पौधों की कथित कटाई की बात सामने आने के बाद अब केवल कटाई करने वालों की पहचान ही महत्वपूर्ण नहीं है।
यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि—
- कटाई कब हुई?
- कितने पौधे काटे गए?
- कौन-कौन सी प्रजातियां प्रभावित हुईं?
- किस क्षेत्र/बीट में कटाई हुई?
- वहां तैनात वन अमला कब-कब गश्त पर गया?
- गश्ती रजिस्टर में क्या दर्ज है?
- क्या वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई?
- यदि कटाई अवैध है तो अब तक FIR/वन अपराध प्रकरण की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के जरिए सामने आना चाहिए।
रेंजर की निगरानी पर सबसे बड़ा सवाल
किसी भी वन परिक्षेत्र की सुरक्षा केवल कागजी व्यवस्था से नहीं चलती। जंगल में अवैध कटाई, शिकार और अतिक्रमण रोकने के लिए मैदानी निगरानी बेहद जरूरी है।
ऐसे में यदि तेलसरा सर्किल के बरसघट्टी जंगल में वास्तव में बड़े पैमाने पर पौधों की कटाई हुई है और यह विभाग की जानकारी में नहीं थी, तो चैतमा वन परिक्षेत्र की निगरानी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पौधे किसने काटे?
सवाल यह भी है कि—
“जिन्हें जंगल की रखवाली करनी थी, उन्हें कटाई की भनक क्यों नहीं लगी?”
हरियाली पर आरा या निगरानी व्यवस्था पर सवाल?
जंगल की सुरक्षा में छोटी सी चूक भी आने वाले वर्षों में बड़ा नुकसान कर सकती है। पौधे वर्षों में तैयार होते हैं, लेकिन उन्हें काटने में कुछ मिनट ही लगते हैं।
यदि बरसघट्टी जंगल में सैकड़ों पौधों की कटाई की पुष्टि होती है, तो यह केवल वन संपदा के नुकसान का मामला नहीं होगा, बल्कि वन सुरक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली की भी गंभीर परीक्षा होगी।
अब जांच से ही खुलेगा पूरा राज!
THE PUBLIC VOICE न्यूज मांग करता है कि वन विभाग के उच्चाधिकारी मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल स्वतंत्र टीम से स्थल निरीक्षण कराएं।
मौके पर जाकर—
कटे पौधों की गिनती हो।
कटाई स्थल की वीडियोग्राफी हो।
कटाई की तारीख और कारण की जांच हो।
विभागीय रिकॉर्ड और गश्ती रजिस्टर की जांच हो।
जिम्मेदार कर्मचारियों की भूमिका तय हो।
और यदि नियमविरुद्ध कटाई प्रमाणित होती है तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
🔴 अब सवाल कार्रवाई का है!
क्या वन विभाग मौके पर पहुंचकर सच्चाई सामने लाएगा?
क्या चैतमा रेंज की निगरानी व्यवस्था की जांच होगी?
क्या कथित कटाई के लिए जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर—
“जंगल कटता रहेगा और फाइलों में सब कुछ सुरक्षित दिखता रहेगा?”
EXPOSE का बड़ा सवाल:
“जब जंगल में सैकड़ों पौधों की कटाई की कथित घटना सामने आई, तो चैतमा वन परिक्षेत्र के जिम्मेदार अमले को इसकी जानकारी आखिर क्यों नहीं हुई?”
अब जंगल जवाब मांग रहा है… और वन विभाग को जवाब देना होगा।





